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Kashmir.कश्मीर: जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ राजनीतिक नेता फारूक अब्दुल्ला ने हाल ही में अपने एक भाषण में जम्मू-कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर न केवल स्थानीय लोगों की पहचान है, बल्कि यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राज्य की विशिष्टता को भी दर्शाती है।
फारूक ने अपने संबोधन में कहा कि जम्मू-कश्मीर में स्थापत्य कला, लोकगीत, नृत्य, हस्तकला और धार्मिक स्थल हमारी सांस्कृतिक पहचान के अभिन्न अंग हैं। उन्होंने सभी नागरिकों, सरकारी संस्थानों और समाजिक संगठनों से आह्वान किया कि वे इस विरासत को संरक्षित करने और युवाओं में इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए मिलकर काम करें।
उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में कई चुनौतियां सामने आई हैं। जैसे कि पुरानी इमारतों का गिरना, ऐतिहासिक दस्तावेजों का नष्ट होना और पारंपरिक कलाओं के प्रति युवाओं में रुचि की कमी। फारूक ने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकारी योजनाओं के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
फारूक ने यह भी बताया कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का मतलब केवल पुरानी चीज़ों को बचाना नहीं, बल्कि उन्हें सकारात्मक रूप में नए स्वरूप और आधुनिक तकनीकों के साथ जीवंत बनाए रखना भी है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि स्थानीय हस्तशिल्प और संगीत को शैक्षिक संस्थानों और पर्यटन कार्यक्रमों के माध्यम से बढ़ावा दिया जा सकता है।
उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे लोककला, लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और हस्तशिल्प को सीखें और आगे बढ़ाएं। फारूक ने कहा कि अगर युवा वर्ग इस विरासत को अपनाता है, तो यह केवल संरक्षण ही नहीं होगा, बल्कि सांस्कृतिक पुनरुद्धार और आर्थिक अवसर भी पैदा करेगा।
इसके अलावा फारूक ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि सांस्कृतिक स्थलों की मरम्मत और संरक्षण के लिए पर्याप्त बजट सुनिश्चित किया जाए और उनके रख-रखाव के लिए स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की सलाह ली जाए। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक विरासत की रक्षा सिर्फ ऐतिहासिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक एकता और पहचान बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है।
समापन में फारूक ने दोहराया कि जम्मू-कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत हमारे अतीत की पहचान और भविष्य की प्रेरणा है। उन्होंने कहा कि सभी नागरिकों और संस्थाओं को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह विरासत सुरक्षित, संरक्षित और संवर्धित रहे।
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